Malegaon Blast Case 2008: 17 साल बाद सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी, जानें क्या है मामला

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मालेगांव विस्फोट क्या है? Malegaon Blast Case 2008

29 सितंबर 2008 की रात महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव शहर में एक भीड़भाड़ वाले मुस्लिम बहुल इलाके में बम विस्फोट हुआ। शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट कंपनी के पास यह धमाका हुआ था। इस विस्फोट में 6 लोगों की मौत हुई और 101 लोग घायल हो गए। घटना रमजान के महीने में एक मस्जिद के पास हुई, जिससे सांप्रदायिक तनाव गहरा गया।

जांच कैसे शुरू हुई? Malegaon Blast Case 2008

मामले की जांच सबसे पहले महाराष्ट्र एटीएस ने की। जांच में सामने आया कि एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल में विस्फोटक लगाया गया था। बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी था और इंजन व चेसिस नंबर भी मिटा दिए गए थे। फॉरेंसिक जांच के बाद पता चला कि यह बाइक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर थी। 23 अक्टूबर 2008 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

 

Malegaon Blast Case
Malegaon Blast Case

Malegaon Blast Case के कौन थे आरोपी?

जांच में एटीएस ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, और समीर कुलकर्णी को भी आरोपी बनाया। इन पर आरोप था कि इन्होंने “अभिनव भारत” नाम का संगठन बनाकर विस्फोट की साजिश रची थी। इन पर UAPA, हत्या, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिकता फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगे।

Malegaon Blast Case की चांज में एनआईए की भूमिका

2011 में केस (Malegaon Blast Case 2008) राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपा गया। 2016 में NIA ने चार्जशीट दाखिल की जिसमें प्रज्ञा ठाकुर और तीन अन्य आरोपियों को क्लीन चिट दे दी गई। NIA ने माना कि मकोका कानून का इस्तेमाल संदिग्ध था और कई सबूत पर्याप्त नहीं थे। उसने सात आरोपियों पर केस जारी रखा।

अदालत में क्या हुआ?

2018 में एनआईए कोर्ट में ट्रायल शुरू हुआ। 432 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें से कई गवाह अपने बयानों से मुकर गए। अदालत में बहस 19 अप्रैल 2025 को समाप्त हुई। जुलाई 2025 में कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि विस्फोट में जिस बाइक का जिक्र किया गया वह प्रज्ञा ठाकुर की थी या उस पर बम रखा गया था।

Malegaon Blast Case पर कोर्ट का फैसला

एनआईए कोर्ट ने सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि: “कोई भी धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। केवल शक या धारणा के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोष सिद्ध करने के लिए ठोस सबूत आवश्यक हैं।”

इसके साथ ही कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट में हेराफेरी, घायलों की संख्या में अंतर और कई गवाहों के पलटने को भी आधार बनाया।

मालेगांव विस्फोट केस भारत की सबसे जटिल जांचों में से एक माना गया, जहां राजनीतिक, धार्मिक और कानूनी स्तर पर कई मोड़ आए। 17 साल की लंबी प्रक्रिया के बाद, जब कोर्ट ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, तब यह बहस फिर से शुरू हुई कि क्या हमारी जांच एजेंसियों और न्याय व्यवस्था को और पारदर्शी और साक्ष्य-आधारित बनाना चाहिए।

 

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